Gul Huyi Jaati Hain-Abida Parveen
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गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निक्लेगी अभी चश्म-ए-माहताब से रात
और मुश्ताक निगाहों की सुिन जाएगी
और उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हाथ
उन का आंचल है कि रुखसार कि पैराहन है
कुछ तो है जिस से हुई जाती है चिलमन रंगीन
जाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छावं में
टिमिटमाता है वो आवेज़ा अभी तक के नही
आज फ़िर हुस्न-ए-दिल-अारा की वो ही धज होगी
वो ही ख्वाबीदा सी आंखें वो ही काज़ल की लकीर
रंग-ए-रुखसार पे हल्का सा वो गाज़े का गुबार
सन्द्ली हाथों पे धुन्धिल सी हिना की तहरीर
अपने अफ्कार के अशआर की दुिनया है यही
जान-ए-मज़मून है ये शाहिद-ए-माना है यही
अपन मौज़ू-ए-सुखन इन के सिवा और नही
तब्बा शायर का वतन इन कॆ सिवा और नही
ये खूं की महक है कि लब-ए-यार की खुशबू
किस राह की जािनब से सबा आती है देखो
गुलशन मे बहार आई के ज़िन्दा हुआ आबाद
किस संग से नगमों की सदा आती है देखो
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(2011-12-16)